काम और सुकून की तलाश: एक भावुक कविता लेखक: कमल एक रिटायर्ड शिक्षक की भावनात्मक यादों से जुड़ी कक्षा की तस्वीर सुबह-सुबह उठने की रोज कै...
काम और सुकून की तलाश: एक भावुक कविता
लेखक: कमल
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| एक रिटायर्ड शिक्षक की भावनात्मक यादों से जुड़ी कक्षा की तस्वीर |
सुबह-सुबह उठने की रोज कैसी यह मजबूरी,
जल्दी स्कूल जाने की फिर भी है तैयारी।
हर दिन का यह सिलसिला भारी सा लगता है,
पर छुट्टी में सब कुछ अधूरा सा लगता है।
लगता है जैसे कुछ छूट गया है,
जिंदगी में जाने कौन रूठ गया है।
जब से काम पर जाने लगा हूं,
मैं अब ये समझने लगा हूं।
वह बरसों तक स्कूल के आंगन में खिले,
अब रिटायर्ड होकर दिल में कुछ छुपाए से मिले।
क्यों हुए थे पिता चिड़चिड़ा अब समझ में आया,
जब छूट जाए कर्म भूमि तो मन घबराया।
वो शोर बच्चों की बातें कक्षा की रौनक,
वही तो थी जीवन की असली चमक।
घर आना अच्छा लगे पर मन कहीं अटका लगे,
जैसे शरीर घर पर और आत्मा वहीं भटका लगे।
सुकून ढूंढते हैं सब पर सुकून कहीं बाहर नहीं,
वो तो बस काम में जहां आत्मा लगे वहीं।।
💭 लेखक की बात
यह कविता उन सभी शिक्षकों, कर्मचारियों और कर्मयोगियों को समर्पित है जो हर दिन काम करते हैं — और जब एक दिन रुक जाते हैं, तो जीवन अधूरा सा लगता है। सच्चा सुकून वही है, जहां मन और आत्मा लगती हो।
