सुबह-सुबह उठने की मजबूरी और सुकून की तलाश
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| स्कूल, जिम्मेदारियों और सुकून की तलाश को दर्शाती एक भावुक तस्वीर। |
जिंदगी हर दिन हमें कुछ नया सिखाती है।
कुछ बातें हमें तब समझ आती हैं, जब हम खुद उन्हें महसूस करते हैं।
बचपन में स्कूल जाना एक जिम्मेदारी लगता था।
सुबह जल्दी उठना, तैयार होना और रोज वही दिनचर्या कभी-कभी बोझ जैसी लगती थी।
लेकिन जब इंसान कामकाजी जिंदगी में कदम रखता है, तब उसे एहसास होता है कि वही भागदौड़ असल में जीवन का सबसे खूबसूरत हिस्सा थी।
यह लेख सिर्फ एक कविता नहीं है,
बल्कि हर उस इंसान की कहानी है जो अपने काम, अपने स्कूल, अपने लोगों और अपनी कर्मभूमि से दिल से जुड़ा हुआ है।
एक एहसास जो उम्र के साथ समझ आता है
जब हम रोज किसी जगह जाते हैं,
तो धीरे-धीरे वह जगह सिर्फ काम करने की जगह नहीं रहती,
बल्कि हमारी जिंदगी का हिस्सा बन जाती है।
स्कूल की घंटियां, बच्चों का शोर, दोस्तों की बातें, कक्षा की हलचल…
ये सब धीरे-धीरे हमारी आत्मा का हिस्सा बन जाते हैं।
और जब कभी यह सब छूटने लगता है,
तब इंसान अंदर से खाली-खाली महसूस करने लगता है।
कविता : सुबह-सुबह उठने की मजबूरी
सुबह-सुबह उठने की रोज कैसी यह मजबूरी,
जल्दी स्कूल जाने की फिर भी है तैयारी।हर दिन का यह सिलसिला भारी सा लगता है,
पर छुट्टी में सब कुछ अधूरा सा लगता है।लगता है जैसे कुछ छूट गया है,
जिंदगी में जाने कौन रूठ गया है।जब से काम पर जाने लगा हूं,
मैं अब ये समझने लगा हूं।वह बरसों तक स्कूल के आंगन में खिले,
अब रिटायर्ड होकर दिल में कुछ छुपाए से मिले।क्यों हुए थे पिता चिड़चिड़ा अब समझ में आया,
जब छूट जाए कर्म भूमि तो मन घबराया।वो शोर बच्चों की बातें कक्षा की रौनक,
वही तो थी जीवन की असली चमक।घर आना अच्छा लगे पर मन कहीं अटका लगे,
जैसे शरीर घर पर और आत्मा वहीं भटका लगे।सुकून ढूंढते हैं सब पर सुकून कहीं बाहर नहीं,
वो तो बस काम में जहां आत्मा लगे वहीं।।— @कमल
सुकून आखिर मिलता कहां है?
आज हर इंसान सुकून की तलाश में है।
कोई पैसे में ढूंढ रहा है,
कोई छुट्टियों में,
तो कोई अकेलेपन में।
लेकिन असली सुकून शायद वहीं मिलता है,
जहां हमारा मन सच में जुड़ा हो।
जिस काम को करते वक्त समय का एहसास ना हो,
जहां थकान भी खुशी लगे,
वहीं इंसान का असली सुकून छुपा होता है।
शिक्षक और कर्मभूमि का रिश्ता
एक शिक्षक सिर्फ पढ़ाता नहीं है,
वह धीरे-धीरे अपने स्कूल, अपने छात्रों और अपने माहौल से भावनात्मक रूप से जुड़ जाता है।
शायद यही कारण है कि रिटायरमेंट के बाद बहुत लोग अंदर से अकेला महसूस करने लगते हैं।
क्योंकि उनकी जिंदगी की सबसे खूबसूरत आवाजें अचानक उनसे दूर हो जाती हैं।
तब समझ आता है कि
काम सिर्फ कमाने का जरिया नहीं था,
वह जीने का हिस्सा था।
अंतिम शब्द
जिंदगी में हर इंसान किसी ना किसी जिम्मेदारी से जुड़ा है।
कभी वही जिम्मेदारियां बोझ लगती हैं,
तो कभी वही हमारी सबसे प्यारी यादें बन जाती हैं।
शायद इसलिए कहा गया है…
“सुकून कहीं बाहर नहीं,
वो तो बस वहीं मिलता है जहां आत्मा को अपनापन महसूस हो।”
लेखक : कमल प्रजापति

